सूर्यसुता माँ यमुना के निर्मल तट पर मैया यशोदा स्नान करने जाती हैं और नन्हे कान्हा को किनारे बैठा देती हैं। खेलते-खेलते बाल गोपाल मिट्टी से क्रीड़ा करने लगते हैं। तभी पृथ्वी माता स्वयं प्रकट होकर उनके चरणों में शीश झुका देती हैं। यदुराई अपनी दिव्यता का आभास कराते हुए पावन मिट्टी को नैवेद्य मानकर ग्रहण करते हैं। मैया यशोदा की सखियाँ इसका शिकायत करती हैं, तो मैया कान्हा को डाँटकर मुँह खोलने को कहती हैं। जैसे ही बाल कृष्ण मुख खोलते हैं, यशोदा की आँखों के सामने अनंत आकाश उतर आता है। ग्रह-नक्षत्र, लोक-परलोक और चराचर जगत उसी मुख में समाया दिखाई देता है। नन्हे कान्हा विराट स्वरूप का दर्शन कराकर मैया को अपनी अलौकिक लीला का अनुभव कराते हैं और अखंड भक्ति का वरदान देते हैं। कथा सागर के इस अद्भुत प्रसंग में देखिए, नन्हे बाल कृष्ण के मुख में संपूर्ण ब्रह्माण्ड के दिव्य दर्शन। मुरलीधर के मुख में अंतर्निहित संसार, उनसे ही तो होना है हम सबका उद्धार। मैया यशोदा को न है इन सबका ज्ञान, उनको लगता कान्हा एकदम ही नादान। छैल-छबीला निश्चित है उनका बालक, किन्तु वही बनेगा इस जग का प्रतिपालक। उसकी दीप्ति अंत करेगी फैला हुआ अँधियार, टूटेगी फिर अविरत तम की काली दीवार। मुरलीधर के मुख में अंतर्निहित संसार, उनसे ही तो होना है हम सबका उद्धार। #ShriKrishna #KathaSagar #RadhaKrishna"
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