भगवान श्रीराम के शांति-दूत बनकर महापराक्रमी अंगद जब दसकंधर की सभा में पहुँचे, तो उन्होंने लंकेश के समक्ष श्री रघुराई का संदेश रखा और युद्ध टालने का अंतिम अवसर भी दिया। लेकिन अहंकार में डूबे रावण ने कभी प्रलोभन, तो कभी भय दिखाकर उस वीर को विचलित करने का असफल प्रयास किया। किन्तु अंगद अडिग रहे, क्योंकि वे जानते थे कि न्याय और नीति उनके साथ हैं। रावण की धृष्टता बढ़ी तो अंगद मुनि ने सभा के बीच अपना पैर इस तरह जमा दिया कि लंका के बलशाली योद्धा मिलकर भी उसे हिला न सके। अंगद का वह अटल चरण उनकी वीरता और दृढ़ संकल्प की ऐसी अमिट मिसाल बन गया, जो युगों-युगों तक स्मरणीय रहेगी। कथा सागर के इस विशेष प्रसंग में देखिए, महावीर अंगद के अद्भुत पराक्रम की गाथा! महावीर अंगद आए, जब दसकंधर के द्वार, डर के मारे काँप उठीं, लंका की दीवार। अंगद ने रघुराई का, रखा वहाँ प्रस्ताव, पर दसानंद कर बैठा, अंगद से दुर्भाव। अंगद के मन में चाहा, भरना उसने द्वेष, पर हुआ निष्फल इसमें, प्रपंची लंकेश। भरी सभा में गाड़ दिया, अंगद ने अपना पैर, ले ना पाया उनसे तब, कोई भी फिर बैर। पैर जमाना अंगद का, बना यह प्रतीक, शत्रु के आगे कभी नहीं, झुकते हैं निर्भीक। #KathaSagar #Ramayan #ShriRam"
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9:38Tilak
14 घंटे पहले